पंचायती राज चुनाव: उदयपुर में 8 सीटों पर रस्साकशी क्यों? खेवनहारों की तलाश में उड़ी आला नेताओं की नींद

उदयपुर। राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की रणभेरी बजते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों के आला नेताओं की नींद उड़ गई है। इस बार टिकट का गणित पूरी तरह बदल गया है।

सूत्रों की मानें तो इस बार जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के टिकट बंटवारे का आधार केवल उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता नहीं, बल्कि उसका पॉलिटिकल होल्ड और दूसरों को जिताने की क्षमता भी बन गया है।

बंद कमरों में चल रही मैराथन बैठकों में सिर्फ एक ही चर्चा है - टिकट उसी को मिलेगा, जो खुद की सीट निकालने के साथ-साथ अपने क्षेत्र के पंचायत समिति सदस्यों को भी चुनावी नैया पार करा सके। लेकिन अधिकतर जिला परिषद टिकट के दावेदार इस अतिरिक्त जिम्मेदारी को निभाने से कतरा रहे हैं।

*सरपंच-उपसरपंच वाला फॉर्मूला*

राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बार जिला परिषद का यह टिकट वितरण बिल्कुल वैसा ही रूप ले चुका है जैसा अमूमन ग्राम पंचायतों में सरपंच और उपसरपंच के चुनाव के समय देखा जाता है।

ग्राम पंचायतों में अक्सर सरपंच पद आरक्षित या महिला के खाते में जाने के बाद, उपसरपंच बनने की चाह रखने वाला नेता अपने समर्थकों को वार्ड पंच के रूप में खड़ा करवाता है ताकि उसका पलड़ा भारी रहे। ठीक इसी तर्ज पर पार्टियां भी जिला परिषद के उम्मीदवारों पर अपने वार्ड में आने वाली सभी ग्राम पंचायतों में पार्टी के पंचायत समिति उम्मीदवारों को जिताने की जिम्मेदारी भी डालने की कवायद कर रही हैं।

उदयपुर में आठ सीटें बनीं हॉट

उदयपुर जिला परिषद के सियासी समीकरणों की बात करें तो यहां वार्ड संख्या 2, 31, 32, 34, 35, 37, 40 और 43 इस बार हॉट सीटें बन चुकी हैं। ये सभी सीटें सामान्य ओपन हैं।

जाहिर सी बात है कि जिस भी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलेगा, जिला प्रमुख का ताज इन्हीं वार्डों से जीतकर आने वाले किसी दिग्गज के सिर सजेगा। ऐसे में इन 8 सीटों पर कई नेताओं की नजरें जमी हुई हैं, लेकिन आला नेता भी यहां फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।

कमजोर उम्मीदवारों के लिए संकटमोचक की तलाश

दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि उन्हें सिर्फ जिला परिषद सदस्य के टिकट पर फोकस नहीं करना है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टियां ऐसे प्रभावशाली चेहरे ढूंढ रही हैं जो अपने वार्ड के पंचायत समिति उम्मीदवारों को भी जीता सकें, क्योंकि दोनों के लिए वोटिंग एक ही दिन होनी है।

इतना ही नहीं अगर पड़ोस की सीट पर पार्टी का उम्मीदवार कमजोर है, तो हैवीवेट उम्मीदवार का प्रभाव इतना होना चाहिए कि वह उस सीट को भी खींचकर पार्टी के पाले में ले आए। यही वो नया विनिंग फॉर्मूला है, जिसने दोनों ही खेमों में टिकटार्थियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।