मेनार में स्वाभिमान की जंग खत्म, अब शनिवार को होगा वर्चस्व का क्लाइमेक्स! 71.24% वोटिंग ने बिगाड़े सारे समीकरण"*
उदयपुर मेनार
कहते हैं राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लेकिन बर्ड विलेज मेनार में चल रहे जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों ने एक नई कहावत लिख दी है - पार्टी अपनी जगह, लेकिन गांव का स्वाभिमान और अपना बंदा अपनी जगह!"*
गुरुवार को मेनार में जो मतदान हुआ, वो सिर्फ EVM का बटन दबाने का खेल नहीं था। वो अंदरखाने लड़ी गई स्वाभिमान की एक गुप्त जंग थी, जिसने बड़े-बड़े राजनैतिक सूरमाओं के गणित को हिला कर रख दिया है।
*आंकड़ों में मेनार का लोकतंत्र उत्सव:*
कुल वोटर्स - 5042
कुल मतदान - 3592
प्रतिशत - *71.24%* - जो जिले के 66.81% से कहीं ज्यादा है!
वार्ड 1,2 में 716 वोट, वार्ड 12,13 में 674 वोट पड़े। इससे साफ है कि मेनार ने इस बार गांव की सरकार के लिए दिल खोलकर वोट किया।
*वार्ड 34 जिला परिषद: 'बाहर वाला vs अपने गांव वाला'*
जिला परिषद वार्ड 34 का मुकाबला सबसे दिलचस्प हो गया। आमने-सामने भाजपा के वाना निवासी घनश्याम मेनारिया और कांग्रेस के दुर्गाशंकर रूपावत।
सीधा गणित कहता है - भाजपाई वोट भाजपा को, कांग्रेसी वोट कांग्रेस को।
लेकिन मेनार के वोटरों के दिल में कुछ और ही चल रहा था! चर्चाओं का बाजार गर्म है कि धुर-भाजपाई समर्थक भी अंदर ही अंदर कांग्रेस के दुर्गाशंकर के पाले में गोटियां फिट कर रहे थे। वजह? भाजपा प्रत्याशी वाना के हैं और फिलहाल वहां रहते भी नहीं हैं। अब गांव वालों का सीधा फंडा है - *जब अपने गांव का बंदा मैदान में खड़ा है, तो पड़ोस के गांव की तरफ झांकने की क्या जरूरत?* इस लोकल सेंटीमेंट का फायदा दुर्गाशंकर को कितना मिलेगा, ये तो पेटी खुलने पर ही पता चलेगा।
*पंचायत समिति में थ्रिलर फिल्म की स्क्रिप्ट:*
पंचायत समिति सदस्य की सीट पर तो बाकायदा राजनैतिक थ्रिलर लिखी गई। भाजपा से पूनम पांचावत और कांग्रेस से गिरजा मेरावत आमने-सामने थीं। ट्विस्ट तब आया जब पैनल में नाम न होने के बावजूद बीजेपी ने पूनम पांचावत को टिकट दे दिया।
बस फिर क्या था? स्थानीय कार्यकर्ताओं का ईगो हर्ट हो गया! उन्होंने स्वाभिमान का झंडा उठाया, पैनल के सभी दावेदार एक जाजम पर आए और रातों-रात एक नया मंच खड़ा कर दिया। इस मंच से निर्दलीय प्रत्याशी *मंजू दावोत* को पूरे दमखम के साथ मैदान में उतार दिया गया। गुरुवार को मंजू दावोत ने जिस तरह से टक्कर दी है, उसने दोनों मुख्य पार्टियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। अब देखना यह होगा कि भाजपा के परंपरागत वोट मैं निर्दलीय कितनी सेंध मार सकती है यह तो समय वक्त बतायेगा
अब नजरें शनिवार पर: असली किंग कौन?*
अब बात शनिवार को होने वाले सरपंच चुनाव के महायुद्ध की। सरपंच पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित है, यानी कुर्सी पर तो घूंघट की ओट में महिला बैठेगी, लेकिन साख और वर्चस्व गांव के पुरुषों का दांव पर लगा है।
जैसे ही आरक्षण की तस्वीर साफ हुई, गांव के बड़े-बड़े दिग्गजों ने कमान हाथ में ले ली है। गुरुवार को जब जिला परिषद के लिए वोटिंग चल रही थी, तब भी हर नुक्कड़ और चाय की थड़ी पर चर्चा सिर्फ एक ही थी - *शनिवार को गांव का असली किंग कौन बनेगा?
मतदान केंद्र पर लगी मतदाओं के8 कतार का दृश्य
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